Friday, July 17, 2009

दिल से

सिर्फ़ पाने का नाम ही तो प्यार नहीं होता
उनको अपना बना लेना ही तो दिल का करार नहीं होता,
क्या हुआ जो हम उनकी आग में जल गए
शमा से घर रोशन करना ही तो प्यार नहीं होता;

क्या हुआ जो उनकी याद सता गई,
क्या हुआ जो दिल को मर्म बना गई,
तन्हाई में तड़पना तो दीवाने का मुकद्दर है
उनकी आघोष में संवरना ही तो मुकद्दर -ऐ- यार नहीं होता;

दर्द में दवा का ही तो इंतज़ार नहीं होता ,
दुःख की घड़ियों में सिर्फ़ सुख का ही तो इंतज़ार नहीं होता ,
तड़पता हूँ बहुत पर दीदार-ऐ-यार नहीं होता
घर तो जला रहा हूँ पर इस दिल को कुछ करार नहीं होता ,
जल रहा हूँ इस आग में पर ये शरीर ख़ाक नहीं होता ,
एक ये काफिर दिल है जो पिघल रहा है
इतना भी नहीं समझता की इससे हासिल-ऐ-यार नहीं होता ;

तूफानों मे कश्ती बहुत फसी है, पर ये दिल कहाँ घबराया है
जख्म तो बहुत मिले हैं पर इतना दर्द कहाँ पाया है
खोया है बहुत , कम ही पाया है
दिल-ऐ-नादाँ तुझे हुआ क्या है जो आज इतना घबराया है ;

गम तो हमने बहुत झेले हैं
पर इतना बेबस कब इस दिल को पाया है
हाल-ऐ-दिल तो बहुत किए हैं बयान
पर आंखों में जल कब भर आया है ;

मैदान-ऐ-ज़ंग में अपनी धार को बहुत आजमाया है
कभी जीत में तो कभी हार में दिल को तनहा पाया है,
कहाँ से आ गया आज ये सुकून,
जो आज इस दिल को हार के हमने पाया है

डूब पाऊँ उन आंखों में ये कहाँ मेरी किस्मत है
समां जाऊं उनके दिल में ये कहाँ मेरी हसरत है
आज पा लूँ उन्हें तो ये दिल जन्नत है
देख लें वोह मुझे प्यार से, मेरी तो यही इबादत है ;

जलते रहे है उनकी आग में
उन्ही की आग में ही जल जायेंगे ,
खेल रहा है कोई इस दिल की आग से
हम तो सर्द रातों में भी ख़ाक हो जायेंगे ;

न बना पाये उन्हें हम अपना
पर ख़ुद हुए उनके नाम ;

इससे भी ऐ दिल क्या तुझे आराम नहीं होता
आखिर पाने का ही नाम तो प्यार नहीं होता .

सिर्फ़ पाने का नाम ही तो प्यार नहीं होता .........

1 comment: