क्या मैं स्वतंत्र हूँ? आज सुबह से इसी जद्दोजहद मैं हूँ, क्या मैं स्वतंत्र हूँ? क्या मेरी अंतरात्मा स्वतंत्र है? क्या मेरी सोच स्वतंत्र है? क्या मेरे विचारों में स्वतंत्रता का वास है ? क्या मेरा अस्तित्व स्वतंत्र है? क्या मेरी कल्पना स्वतंत्र परों पे उड़ान भरती है? क्या मेरी सांसों में स्वतंत्रता की महक है? क्या मेरा परिवेश स्वतंत्र है? क्या मेरा राष्ट्र स्वतंत्र है? क्या मेरा समाज स्वतंत्र है? क्या मेरे और मेरे राष्ट्र का विकास ऐसे पथ पर अग्रसर है जो स्वतंत्रता के परवानो से रोशन है ? क्या मैं स्वतंत्र हूँ, अपने ही समाज की कुरीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ जाहिर करने से ?सबसे बड़ा सवाल , क्या मैं स्वतंत्र हूँ इस समाज में सच की राह पे चलने में ?
मय तो पैमानों से नाप लेता हूँ, पर ऐसा पैमाना आज कोई मुझे भी दे की मैं अपनी आज़ादी भी नाप लूँ। उपरोक्त सवाल जो मुझे विचलित किए हैं इन्हे हमारे सम्विध्हान और कानून में न ढूँढिये, अगर खोजना ही है तो अपनी अंतरात्मा के पटल पे खोजिये क्यूंकि वोह कभी झूठ नहीं बोलती।
क्या मैं स्वतंत्र हूँ, क्या आप स्वतंत्र हैं, क्या हम स्वतंत्र हैं, क्या हमारा राष्ट्र स्वतंत्र है ?
एक उम्र बीत गई, बचपना बीत गया और बीत गया वो सुख का आलम जब आजादी का पर्याय माता पिता की सहमती हुआ करता था, और बीत गए वो २५ साल। बहुत कुछ बदल गया, बदल गए दोस्त, बदल गया वो समाज , बदल गया वोह नजरिया, बदल गए खुशियों के पैमाने , बड़ गई महत्वाकांक्षाएं , समझ में आया स्वतंत्रता का मूल्य और भर गया एक रोष जिसने चित्त को ऐसे जकडा की वो कभी आज़ाद न हो पाया कुछ ना बदला इतने वर्षों में तो बस हमारे नेताओं के भाषण और वादे, वही पुराने १५ अगस्त या २६ जनवरी के भाषण जिनकी शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से शुरू होती है और अंत सरकार की झूटी उपलब्धियों पर। एक रोष भर जाता है मेरे मष्तिष्क में, शरीर में एक कम्पन सी महसूस होती है, नसें फटने लगती हैं और एक रक्त में उबाल सा आ जाता है जब स्वतंत्रता दिवस पर इस बेईमानी का सामना करना पड़ता है ।
आज अपने आप को एक भय में जकडा पाता हूँ , मौजूदा हालात में भय रहता है की घर से दफ्तर पहुँच पाऊँगा या नही, दफ्तर पहुँच गया तो ठीक है पर क्या घर सकुशल पहुँच पाऊँगा, कहीं किसी कोने में, किसी मोड़ पे , किसी गली में, किसी चौराहे पे, कहीं बाज़ार में कोई विस्फोटक मेरे इंतज़ार में तो नहीं होगा।
क्यूँ मुझे समाज की नाजायज़ कुरीतियों के ख़िलाफ़ बोलने से डर लगता है, मैं क्यूँ घबरा जात हूँ अपना जायज हक मांगने से, क्यूँ मुझे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगता है, क्यूँ मैं घर से निकलते हुए अपनी मुट्ठी भर जमा पूँजी को दो तालों में में बंद कर जाता हूँ?
क्यूँ मुझे बुराई से इत्नना डर लगता है और अच्छाई पे विश्वास नहीं, क्यूँ मैं भरी बाज़ार बेइज्जत होने पर भी जलालत के आंसू पी जाता हूँ।
क्यूँ मैं इतना गमगीन हूँ और खुशी मुझसे इतनी दूर है, क्यूँ मैं मैं नहीं और समाज का हारा हुआ एक रूप हूँ, क्यूँ दिल में इतना दर्द है और राहत इतनी दूर है।
क्यूँ आज डॉक्टर से आपरेशन कराते दिल घबरा जाता है, क्यूँ आज पुलिस थाने रिपोर्ट लिखाते मन डर जाता है, क्यूँ आज नौकरी ढूँढ़ते कुछ खोने का ख्याल आता है ?
क्यूँ बाजार की शोहरत घर की जीनत बन जाती है और घर की जीनत बाजार में बिक जाती है ?
क्यूँ इंसान की कीमत चंद सिक्कों में लग जाती है और चंद सिक्के जान पे भारी पड़ जाते हैं?
क्यूँ आध्यात्मक सोच को शीशे में उतारा है और अराजकता के लिए आसमान सारा है?
क्या मैं स्वतंत्र हूँ?
क्या आप स्वतंत्र हैं?
क्या हम स्वतंत्र हैं?
इस सब के बाद भी हम दावा करते हैं महान राष्ट्र होने का। मैं नहीं मानता हम एक महान राष्ट्र हैं पर मुझे द्रिड विश्वास है अगर हम चाहे तो महान राष्ट्र बन सकते हैं।
हम अपने आपको कैसे महान राष्ट्र कह सकते हैं जहाँ भाड़े के कुछ आतंकी हमारे राष्ट्र के सीने में गोलियां दाग जाते हैं। हम वहीँ है जो जाति और धर्म के नाम पे अपनों का बेदर्दी से खून बहाते है, हम वही है जो हमारे संविधान के हमलावरों को उन्हें उनके उचित अंजाम तक नहीं पहुँचा पाते । इसके बाद हम डंका भरते हैं की हम महान राष्ट्र हैं।
ये भ्रष्ट राजनीति भी हमारी ही देन है क्यूंकि हम कभी इतनी हिम्मत ही नहीं जुटा पाये की मोर्चे ख़ुद संभाले या कभी कोई इमानदार और कर्तव्य परायण उमीदवार राजनीति में उतरा, तो भी उसे समर्थन नहीं दिया क्यूंकि जाती और धर्म से ऊपर हमारी सोच पहुँच ही नहीं पाती । क्या करें गुलामी करने का तो लंबा इतिहास है।
१९४७ से पहले हमारा एक दुश्मन था , अंग्रेजों की गुलामी; पर आज आजादी के ६२ साल बाद हालात बत्तर हैं। आज गुलामी है डर, आतंकवाद, भ्रस्ताचार, और दलगत राजनीति की। एक बार हमारा राष्ट्र पहले भी बँट चुका है, जिसके दर्द से आज तक हमारी आँखें नम है। और आज हम एक बार फ़िर बँट चुके हैं जाति , धर्म, वर्ग, और सभ्यता के आधार पे। देश के इतने टुकड़े होंगे की हम सब के नाम का एक होगा और वो हमारे ही खून से रंगा होगा।
मैं नहीं मानता की हम स्वतंत्र हैं, मैं अपनी आंखों में स्वतंत्रता की झूटी पट्टी नहीं बाँध सकता। आख़िर कब तक मुह मोडेंगे, कभी तो सामना करना ही होगा, कहीं इतनी देर न हो जाए की गुलामी की जन्जीरियों में दुबारा जकड जाएँ। मेरा प्रबल विश्वास है की इसका समाधान भी हमारे भीतर ही हैं।
क्यूँ न आजादी की इस वर्षगाँठ हम प्रयास करें समाधान ढूँढने की । विचारों का मंथन होगा तो समाधान जरूर निकलेगा और समाधान का कार्यान्वयन होगा तो हम सही मायनों में स्वतंत्रता पाएंगे।
आप अपनी राय जरूर लिखिए। व्यवस्था को बदलने के लिए उसमे सम्मिलित होना जरूरी है॥
मय तो पैमानों से नाप लेता हूँ, पर ऐसा पैमाना आज कोई मुझे भी दे की मैं अपनी आज़ादी भी नाप लूँ। उपरोक्त सवाल जो मुझे विचलित किए हैं इन्हे हमारे सम्विध्हान और कानून में न ढूँढिये, अगर खोजना ही है तो अपनी अंतरात्मा के पटल पे खोजिये क्यूंकि वोह कभी झूठ नहीं बोलती।
क्या मैं स्वतंत्र हूँ, क्या आप स्वतंत्र हैं, क्या हम स्वतंत्र हैं, क्या हमारा राष्ट्र स्वतंत्र है ?
एक उम्र बीत गई, बचपना बीत गया और बीत गया वो सुख का आलम जब आजादी का पर्याय माता पिता की सहमती हुआ करता था, और बीत गए वो २५ साल। बहुत कुछ बदल गया, बदल गए दोस्त, बदल गया वो समाज , बदल गया वोह नजरिया, बदल गए खुशियों के पैमाने , बड़ गई महत्वाकांक्षाएं , समझ में आया स्वतंत्रता का मूल्य और भर गया एक रोष जिसने चित्त को ऐसे जकडा की वो कभी आज़ाद न हो पाया कुछ ना बदला इतने वर्षों में तो बस हमारे नेताओं के भाषण और वादे, वही पुराने १५ अगस्त या २६ जनवरी के भाषण जिनकी शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से शुरू होती है और अंत सरकार की झूटी उपलब्धियों पर। एक रोष भर जाता है मेरे मष्तिष्क में, शरीर में एक कम्पन सी महसूस होती है, नसें फटने लगती हैं और एक रक्त में उबाल सा आ जाता है जब स्वतंत्रता दिवस पर इस बेईमानी का सामना करना पड़ता है ।
आज अपने आप को एक भय में जकडा पाता हूँ , मौजूदा हालात में भय रहता है की घर से दफ्तर पहुँच पाऊँगा या नही, दफ्तर पहुँच गया तो ठीक है पर क्या घर सकुशल पहुँच पाऊँगा, कहीं किसी कोने में, किसी मोड़ पे , किसी गली में, किसी चौराहे पे, कहीं बाज़ार में कोई विस्फोटक मेरे इंतज़ार में तो नहीं होगा।
क्यूँ मुझे समाज की नाजायज़ कुरीतियों के ख़िलाफ़ बोलने से डर लगता है, मैं क्यूँ घबरा जात हूँ अपना जायज हक मांगने से, क्यूँ मुझे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगता है, क्यूँ मैं घर से निकलते हुए अपनी मुट्ठी भर जमा पूँजी को दो तालों में में बंद कर जाता हूँ?
क्यूँ मुझे बुराई से इत्नना डर लगता है और अच्छाई पे विश्वास नहीं, क्यूँ मैं भरी बाज़ार बेइज्जत होने पर भी जलालत के आंसू पी जाता हूँ।
क्यूँ मैं इतना गमगीन हूँ और खुशी मुझसे इतनी दूर है, क्यूँ मैं मैं नहीं और समाज का हारा हुआ एक रूप हूँ, क्यूँ दिल में इतना दर्द है और राहत इतनी दूर है।
क्यूँ आज डॉक्टर से आपरेशन कराते दिल घबरा जाता है, क्यूँ आज पुलिस थाने रिपोर्ट लिखाते मन डर जाता है, क्यूँ आज नौकरी ढूँढ़ते कुछ खोने का ख्याल आता है ?
क्यूँ बाजार की शोहरत घर की जीनत बन जाती है और घर की जीनत बाजार में बिक जाती है ?
क्यूँ इंसान की कीमत चंद सिक्कों में लग जाती है और चंद सिक्के जान पे भारी पड़ जाते हैं?
क्यूँ आध्यात्मक सोच को शीशे में उतारा है और अराजकता के लिए आसमान सारा है?
क्या मैं स्वतंत्र हूँ?
क्या आप स्वतंत्र हैं?
क्या हम स्वतंत्र हैं?
इस सब के बाद भी हम दावा करते हैं महान राष्ट्र होने का। मैं नहीं मानता हम एक महान राष्ट्र हैं पर मुझे द्रिड विश्वास है अगर हम चाहे तो महान राष्ट्र बन सकते हैं।
हम अपने आपको कैसे महान राष्ट्र कह सकते हैं जहाँ भाड़े के कुछ आतंकी हमारे राष्ट्र के सीने में गोलियां दाग जाते हैं। हम वहीँ है जो जाति और धर्म के नाम पे अपनों का बेदर्दी से खून बहाते है, हम वही है जो हमारे संविधान के हमलावरों को उन्हें उनके उचित अंजाम तक नहीं पहुँचा पाते । इसके बाद हम डंका भरते हैं की हम महान राष्ट्र हैं।
ये भ्रष्ट राजनीति भी हमारी ही देन है क्यूंकि हम कभी इतनी हिम्मत ही नहीं जुटा पाये की मोर्चे ख़ुद संभाले या कभी कोई इमानदार और कर्तव्य परायण उमीदवार राजनीति में उतरा, तो भी उसे समर्थन नहीं दिया क्यूंकि जाती और धर्म से ऊपर हमारी सोच पहुँच ही नहीं पाती । क्या करें गुलामी करने का तो लंबा इतिहास है।
१९४७ से पहले हमारा एक दुश्मन था , अंग्रेजों की गुलामी; पर आज आजादी के ६२ साल बाद हालात बत्तर हैं। आज गुलामी है डर, आतंकवाद, भ्रस्ताचार, और दलगत राजनीति की। एक बार हमारा राष्ट्र पहले भी बँट चुका है, जिसके दर्द से आज तक हमारी आँखें नम है। और आज हम एक बार फ़िर बँट चुके हैं जाति , धर्म, वर्ग, और सभ्यता के आधार पे। देश के इतने टुकड़े होंगे की हम सब के नाम का एक होगा और वो हमारे ही खून से रंगा होगा।
मैं नहीं मानता की हम स्वतंत्र हैं, मैं अपनी आंखों में स्वतंत्रता की झूटी पट्टी नहीं बाँध सकता। आख़िर कब तक मुह मोडेंगे, कभी तो सामना करना ही होगा, कहीं इतनी देर न हो जाए की गुलामी की जन्जीरियों में दुबारा जकड जाएँ। मेरा प्रबल विश्वास है की इसका समाधान भी हमारे भीतर ही हैं।
क्यूँ न आजादी की इस वर्षगाँठ हम प्रयास करें समाधान ढूँढने की । विचारों का मंथन होगा तो समाधान जरूर निकलेगा और समाधान का कार्यान्वयन होगा तो हम सही मायनों में स्वतंत्रता पाएंगे।
आप अपनी राय जरूर लिखिए। व्यवस्था को बदलने के लिए उसमे सम्मिलित होना जरूरी है॥

I definitely feel that u can make a difference with your pen.. keep doing good.
ReplyDeleteDear Anna, every senstive and right thinking citizen of this country will be in full agriment with your views but is as helpless as you to change the system. You are at least expressing the voice of masses. Indeed it is a master peice,you have developed a good vocabulary in Hindi aswel. Keep it up
ReplyDeletePapa